Sunday, June 28, 2009

गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी


(गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गई थी, जो गाँधी जी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’, 30 अप्रैल, 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी. यहाँ सुखदेव के पत्र को प्रकाशित किया जा रहा है)

*********************

परम कृपालु महात्मा जी,

आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की सफलता के बाद आपने क्रांतिकारी कार्यकर्त्ताओं को फिलहाल अपना आंदोलन बंद कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौक़ा देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं.

वस्तुतः किसी आंदोलन को बंद करना केवल आदर्श या भावना से होनेवाला काम नहीं है. भिन्न-भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता है.

माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अंतिम समझौता न होगा.

मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ गए होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले-मकसूद पर पहुँच गए हैं.

संपूर्ण स्वतंत्रता जब तक न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बँधी हुई है.

उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा विश्राम है.

इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की कल्पना की जा सकती और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है.

किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आंदोलन के अगुआओं का है.

लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आपने फिलहाल सक्रिए आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो भी वह प्रस्ताव तो कायम ही है.

इसी तरह हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही साफ पता चलता है कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाज-सत्तावादी प्रजातंत्र की स्थापना करना है.

यह प्रजातंत्र मध्य का विश्राम नहीं है. उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बँधे हुए हैं.

परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध-नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे. क्रांतिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौकों पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है.

कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आंदोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है.

ऐसी दशा में क्रान्तिवादियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. परंतु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं सकता.

आपके समझौते के बाद आपने अपना आंदोलन बंद किया है, और फलस्वरूप आपके सब कैदी रिहा हुए हैं.

पर क्रांतिकारी कैदियों का क्या? 1915 से जेलों में पड़े हुए गदर-पक्ष के बीसों कैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं.

मार्शल लॉ के बीसों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाये पड़े हैं. यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है.

देवगढ़, काकोरी, मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बंद पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं.

लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यंत्र के मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिवादी भागते-फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं.

सचमुच आधे दर्जन से अधिक कैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं. इन सबका क्या?

लाहौर षड्यंत्र केस के सज़ायाफ्ता तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गए हैं और जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं.

उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नहीं है. सच पूछा जाए तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है.

यह सब होते हुए भी आप इन्हें अपना आंदोलन बंद करने की सलाह देते हैं. वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है.

ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आंदोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.

यदि ऐसी बात नहीं है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते.

अपना आंदोलन बंद करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धी की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए था.

मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनंद मानने वाले हैं.

मैं आपको कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक उसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख्याल होता है.

और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यंत महत्त्व का मानते हैं, हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा और कोई चारा उनके लिए नहीं है.

उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने आंदोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाए. अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है.

ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करनेवाली होगी.

इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्राँतिकारी नेताओं से बातचीत कीजिए-उनमें से कई जेलों में हैं- और उनके साथ सुलह कीजिए या ये सब प्रार्थनाएँ बंद रखिए.

कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से एक कोई रास्ता चुन लीजिए और सच्चे दिल से उस पर चलिए.

अगर आप उनकी मदद न कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें. उन्हें अलग रहने दें. वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं.

वे जानते हैं कि भावी राजनैतिक युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रांतिकारी पक्ष को ही मिलनेवाला है.

लोकसमूह उनके आसपास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जमसमूह को अपने झंडे तले, समाजसत्ता, प्रजातंत्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे.

अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिए.

आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे.

आपका
अनेकों में से एक

(यह पत्र 80 के दशक में राजकमल प्रकाशन ने हिंदी में छापा था.)


सद्दाम हुसैन: बिना पटकथा का शो-मैन !!


एक साल पहले जब सद्दाम हुसैन की हथकड़ियाँ उतार कर कोर्ट के कटघरे में पेश किया गया था तो वे कोर्ट पर हावी थे. उस समय इराक़ या अन्य जगह भी अपने समर्थकों में उनकी छवि प्रभावित हुई थी.

ये वही आदमी था जिसने एक बार लोगों से अपील की थी कि वे उनकी रक्षा में अपने जान की बाज़ी लगा दे लेकिन अब उसी व्यक्ति ने एक तरह अमरीक के सामने समर्पण कर दिया था.

धीरे-धीरे वे अदालत में अच्छे दिखने लगे. वे अब अपने लिए ख़ास तौर पर तैयार किए गए कपड़े पहनकर अदालत में आने लगे. साथ ही वे अब यह भी जान गए कि अदालत में अपनी बातों को कैसे पेश करना है.

उन्हें दुज़ैल में शिया मुसलमानों के क़त्ल-ए-आम और अनफ़ल में कुर्दों के ख़िलाफ़ चलाए गए अभियान संबंधी मुक़दमों में इस कारण मदद मिली क्योंकि इन मामलों में सबूत प्रभावी नहीं थे और बहस भी असरदार नहीं थी.

यह पूरी न्यायिक प्रक्रिया वही हैं जो सद्दाम के ज़माने में विकसित हुई थी और उस पर उनका पूरी तरह नियंत्रण हुआ करता था. उनके कार्यकाल में न्याय प्रक्रिया पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता था.

सद्दाम अदालत में पेशी के दौरान अक्सर क़ुरान लाया करते थे. कई मामलों में वे अपनी बात कहने के दौरान इसका हवाला भी दिया करते थे.

कई बार तो वह क़ुरान की आयतों को ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर अपने विरोधियों को अपनी बातें कहते थे. शायद उन्हें लगता था कि कोई दूसरा रास्ता उतना प्रभावी न हो.

दुजैल से संबंधित मुक़दमे के दौरान तो उन्होंने जज के अस्तित्व को ही स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. इस दौरान जब उनसे कोई सवाल किया जाता तो वह अपनी किसी ग़लती को अस्वीकार कर देते थे.

वे अदालत में भी ख़ुद को इराक़ का राष्ट्रपति कहते थे और जज और वकीलों को कहते थे कि उनका उसी रूप में सम्मान किया जाए. साथ ही उनका कहना था कि इराक़ पर अमरीकी हमला ग़ैरक़ानूनी है.

अगर वे अमरीक़ी हमले के क़ानूनी औचित्य पर तर्कपूर्ण तरीक़े से ज़ोर डालते तो शायद अपनी बातों को अधिक प्रभावी तरीक़े से रख पाते.

लेकिन वे ऐसा करने में विफल रहे और उन्होंने इस मामले मे अपनी विद्वता का इस्तेमाल नहीं किया. इतनी ही नहीं उन्होंने अपने मामले में रक्षात्मक रवैया कभी नहीं अपनाया.

दुजैल मुक़दमे के दौरान उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया के उनके साथ हिरासत में कैसा व्यवहार किया जा रहा था.

वह अक़्सर इसी तरह कि शिकायतें अदालत में किया करते. बाद में उनकी बातों पर तब कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता था. कई बार तो उनकी बातों को मज़ाक़िया तौर पर लिया जाने लगा.

सद्दाम हुसैन अपनी बातों को अदालत में औपचारिक तौर पर रखते तो मुमकिन था कि उन लोगों में भी उनके प्रति सहानुभूति आती जिन्हें कभी उन्होंने अपने रवैए से आतंकित कर रखा था.

Saturday, June 27, 2009

गांधीजी को क्यों नहीं मिला नोबेल?

पिछले दिनों जब वर्ष 2006 के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई तो कई विशेषज्ञों ने इस पर नाक-भौं चढ़ाई क्योंकि इस बार यह पुरस्कार बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक और उसके सूत्रधार मोहम्मद युनूस को दिया गया है.

मोहम्मद युनूस ग्रामीण महिलाओं को कर्ज़ देकर उनको ग़रीबी के दलदल से निकालने के लिए संघर्ष करते रहे हैं.

आलोचकों का कहना है कि दुनिया भर में कई लोग शांति के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा कर काम कर रहे हैं.

यह लोग बरसती गोलियों और धमाकों में, आग उगलते टैंकों और मौत के साए में अपना मिशन जारी रखे हुए हैं.

लेकिन इन सबको नज़रअंदाज़ कर शांति का नोबेल पुरस्कार एक ऐसे व्यक्ति को दे दिया गया जिसे अर्थशास्त्र की श्रेणी में नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए था.

शांति के लिए नोबेल पुरस्कार का मुद्दा हमेशा से विवाद का विषय बना रहा है.


क्यों नहीं मिला नोबेल?

वर्ष 1901 से नोबेल पुरस्कार की शुरुआत के बाद अब तक यह पुरस्कार 94 लोगों को दिया जा चुका है.

लेकिन ऐसे अवसर 19 बार आये हैं जब पुरस्कार के लिए किसी को भी मुनासिब नहीं समझा गया.

इस कारण पुरस्कार किसी संस्था को दे दिया गया. रेडक्रॉस को यह पुरस्कार तीन बार दिया जा चुका है.

इधर हाल में गांधीगिरी की चर्चा के बाद यह सवाल एक बार फिर बहस का केंद्र बन गया है कि आख़िर शांति का नोबेल पुरस्कार महात्मा गांधी को क्यों नहीं दिया गया जो आधुनिक युग के शांति के सबसे बड़े दूत माने जाते हैं.

नोबेल कमेटी ने इस बात पर कभी टिप्पणी नहीं की इसिलए आम तौर पर लोगों का यह ख़्याल रहा है कि नोबेल कमेटी गांधी जी को इस पुरस्कार से सम्मानित कर अंग्रेज़ी साम्राज्य की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती थी.

लेकिन हाल ही में कुछ दस्तावेज़ों से यह उजागर हुआ है कि नोबेल कमेटी पर इस तरह का कोई दबाव ब्रितानी सरकार की तरफ़ से नहीं था.

चार बार नामांकन

गांधीजी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चार बार नामांकित किया गया था.

इन्हें लगातार 1937, 1938 और 1939 में नामांकित किया गया था. इसके बाद 1947 में भी उनका नामांकन हुआ.

फिर आख़िरी बार इन्हें 1948 में उन्हें नामांकित किया गया लेकिन महज़ चार दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी गई.

पहली बार नॉर्वे के एक सांसद ने उनका नाम सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

उस समय के उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि नोबेल कमेटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने इस बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है.

उन्होंने लिखा है कि वह अहिंसा की अपनी नीति पर हमेशा क़ायम नहीं रहे और उन्हें इन बातों की कभी परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ उनका अहिंसक प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है. (इसके बाद के हालात ने यह साबित किया कि इस तरह का शक बेबुनियाद नहीं था).


'अहिंसा का सबक गांधी से सीखा'

जैकब वारमुलर ने लिखा है कि गांधी जी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही यहाँ तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों तक सीमित रहा.

उन्होंने कालों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िंदगी गुज़ार रहे थे.

अब इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे गांधी जी के रुहानी शागिर्द हैं और उन्होंने अहिंसक संघर्ष का सबक़ गांधी जी के कारनामों से सीखा है.

1947 में शांति पुरस्कारों के लिए सिर्फ़ छह लोगों को नामज़द किया गया था.

उनमें गांधी जी का नाम भी शामिल था लेकिन भारत विभाजन के बाद गांधी जी के कुछ विवादस्पद बयान जो कुछ अख़बारों में पहले ही छप चुके थे, के कारण वह शांति पुरस्कार से वंचित रह गए.

यह पुरस्कार मानवाधिकार आंदोलन क्वेकर को दे दिया गया था.

पेचीदगियाँ

1948 में ख़ुद क्वेकर ने इस पुरस्कार के लिए गांधी जी का नाम प्रस्तावित किया.

नामांकन की आख़िरी तारीख़ के महज़ दो दिन पूर्व गांधी जी की हत्या हो गई. इस समय तक नोबेल कमेटी को गांधी जी के पक्ष में पांच संस्तुतियां मिल चुकी थीं.

लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था.

हालांकि इस समय इस तरह की क़ानूनी गुंजाइश थी कि विशेष हालात में यह पुरस्कार मरणोपरांत भी दिया जा सकता है.

लेकिन कमेटी के समक्ष तब यह समस्या थी कि पुरस्कार की रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि गांधी जी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था. उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी.

हालांकि यह मामला भी कोई क़ानूनी पेचीदगियों से भरा नहीं था जिसका कोई हल नहीं होता लेकिन कमेटी ने किसी भी ऐसे झंझट में पड़ना मुनासिब नहीं समझा.

तब हालत यह हो गई कि 1948 में नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया.


गवां दिया मौका

कमेटी में अपनी प्रतिक्रिया में जो कुछ लिखा है उससे यह आभास होता है कि अगर गांधी जी को अचानक मौत का सामना नहीं करना पड़ता तो उस वर्ष का नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिलता.

कमेटी ने कहा था कि किसी भी ज़िंदा उम्मीदवार को वह इस लायक़ नहीं समझती इसलिए इस साल का नोबेल इनाम किसी को भी नहीं दिया जाएगा.

इस बयान में ज़िंदा शब्द ध्यान देने योग्य है. इससे इशारा मिलता है कि मरणोपरांत अगर किसी को यह पुरस्कार दिया जाता तो गांधी जी के अलावा वह व्यक्ति और कौन हो सकता है.

आज यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या गांधी जी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी.

इस सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब है कि गांधी जी की इज़्ज़त और महानता नोबेल पुरस्कार से भी बड़ी थी.

अगर नोबेल कमेटी उन्हें यह पुरस्कार देती तो इससे उसी की शान बढ़ जाती. लेकिन नोबेल कमेटी ने यह अवसर गंवा दिया.



गाँधीजी और मीराबेन के रिश्ते पर सवाल

लेखक सुधीर कक्कड़ का मानना है कि महात्मा गाँधी और उनकी विदेशी शिष्या मीराबेन के बीच गहरे रिश्ते थे.

महात्मा गाँधी और मीराबेन के रिश्तों को लेकर लिखी गई सुधीर कक्कड़ की किताब ‘मीरा एंड द महात्मा’ में इन रिश्तों की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है.

महात्मा गाँधी के मीराबेन को लिखे पत्रों तथा मीराबेन के महात्मा गाँधी और पृथ्वी सिंह को लिखे पत्रों के आधार पर सुधीर कक्कड़ ने यह किताब लिखी है.

इस किताब में प्रकाशित पत्रों के आधार पर कक्कड़ कहते हैं कि दोनों रात में बैठकर बातें किया करते थे. इस बातचीत के दौरान दोनों के मन में यौनेच्छा भी जागृत होने लगी थी और दोनों एक दूसरे के क़रीब आना चाहते थे.

सुधीर कक्कड़ मानते हैं कि इस मनोस्थिति से महात्मा गाँधी को परेशानी होने लगी थी और वे इससे बचना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने बाद में मीराबेन से दूरी बना ली थी.

किताब में प्रकाशित पत्रों के अनुसार मीराबेन ने लिखा है कि वे गाँधीजी की त्वचा को नर्म और लचीला बनाने के लिए वे घी से मालिश किया करती थीं.

दूसरी ओर गाँधीजी ने भी मीराबेन को अपने पत्र में लिखा है, “तुम मेरे ख़यालों में हो, मैं अपने बारे में सोचता हूँ और तुम्हारी याद आती है. मैं चरखा खोलता हूँ तो तुम्हारी याद आती है.”

इसी पत्र में उन्होंने मीराबेन से कहा है कि वे महात्मा गाँधी की सेवा के लिए अपने देश को छोड़कर नहीं आईं हैं वे एक उद्देश्य से यहाँ आई हैं और उन्हें यही करना चाहिए.

इस किताब से ज़ाहिर होता है कि गाँधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी यानी बा के संबंधों पर भी असर पड़ने लगा था और आख़िरकार गाँधीजी को मीराबेन को अपने से दूर हो जाने के लिए कहना पड़ा था.

एक अंग्रेज़ी अख़बार से बात करते हुए सुधीर कक्कड़ ने कहा, “मीराबेन और बापू की नज़दीकी से बा को तकलीफ़ होने लगी थी और उन्होंने महसूस किया कि बापू कोई महात्मा नहीं हैं.

मीराबेन एक अंग्रेज़ एडमिरल की बेटी थीं और उनका असली नाम मैडेलिन स्लेड था.

1925 में 33 साल की उम्र में वे गाँधीजी के साथ काम करने के लिए भारत आ गई थीं और उस समय गाँधीजी की उम्र 56 साल थी.

बाद में वे इंग्लैंड वापस लौट गईं और फिर ऑस्ट्रिया के वियना में एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थीं. वहीं 1968 में सुधीर कक्कड़ ने उनसे मुलाक़ात की थी.

सुधीर कक्कड़ ने अपनी किताब में इन पत्रों को आधार बनाया है और कुछ वास्तविक घटनाओं के अलावा मीराबेन की कल्पित डायरी और रोम्याँ रोलाँ को लिखे उनके कल्पित पत्रों का सहारा लिया है.

मीराबेन और गाँधीजी के रिश्तों को नज़दीकी बताते हुए कक्कड़ कहते हैं कि गाँधीजी ने मीराबेन को 350 पत्र लिखे जो किसी भी व्यक्ति को लिखे गए पत्रों में सबसे अधिक है.

हालांकि गाँधीजी के बारे में इस तरह की बातें कोई नई बात नहीं है.

स्वयं गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अपने जीवन के आरंभिक दिनों में उनकी यौनेच्छा उन पर हावी थी.

आत्मसंयम के उनके प्रयोग भी विवादास्पद रहे हैं.

गोड्से और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ !

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गाँधी ने से कहा कि गोड्से को आरएसएस ने इस्तेमाल करके उसी तरह छोड़ दिया जैसे कोई संगठन हथियार के इस्तेमाल के बाद उसे फेंक देता है.

गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सरकार ने पाबंदी लगा दी थी और सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर सहित आरएसएस के तमाम नेताओं को जेल में बंद कर दिया था.

बाद में संघ पर से पाबंदी हटा ली गई लेकिन गोड्से को लेकर हिंदुत्ववादी संगठनों में हमेशा असमंजस की स्थिति बनी रही.

देवेंद्र स्वरूप ही नही बल्कि बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक प्रकाश शर्मा ने भी कहा है कि गांधीजी कि हत्या के पीछे गोड्से की कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी.

प्रकाश शर्मा ने कहा, "नाथूराम गोड्से के दिल में देश को लेकर पीड़ा थी और उन्होंने उस समय जो उचित समझा वो ही किया."

गुजरात में फरवरी 2002 में भड़के मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान भी संघ परिवार को गांधी के अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता के विचारों से मुश्किल हुई.

उस दौरान विश्व हिंदू परिषद् के महामंत्री प्रवीण तोगडिया ने एक आम सभा में कहा था, "इस देश में गांधी की विचारधारा चल रही है. हमने 28 तारीख़ को गांधी को अपने घरों में बंद कर दिया. तुम गजनी को छोड़ दो, हम गाँधी को छोड़ देंगे. जब तक दुनिया में गांधी का विचार चल रहा है, मुसलमानों के सामने घुटना टेकने का विचार चल रहा है तब तक आतंकवाद से नहीं निबटा जा सकता."

अलबत्ता जब आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो हम इससे सहमत नही हैं."

आरएसएस ने बाद में गांधी और अंबेडकर का नाम प्रातःस्मरणीय लोगों में शामिल किया.

घोषित तौर पर संघ परिवार गोड्से को अस्वीकार करता है लेकिन अब भी उसके काम को संघ के लोग निःस्वार्थ बताते हैं.

चर्चिल की मंशा थी, 'गांधी मरें तो मरें'

ब्रितानी कैबिनेट के हाल ही में प्रकाशित कागज़ातों से विंस्टन चर्चिल की उस मंशा का पता चलता है जिसके मुताबिक वो चाहते थे कि गांधी अगर भूख हड़ताल पर बैठते हैं तो उन्हें मरने देना चाहिए.

ऐसे कागज़ातों की एक प्रदर्शनी इन दिनों लंदन स्थित केव अभिलेखागार में चल रही है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल का मानना था कि महात्मा की छवि वाले गांधी अगर अंग्रेज़ी हुकूमत की गिरफ़्त में भूख हड़ताल पर बैठते हैं तो उनके साथ भी आम लोगों जैसा बर्ताव होना चाहिए.

हालाँकि उनके मंत्रियों ने उन्हें ऐसा न होने देने के लिए समझाया क्योंकि अगर गांधी की मृत्यु अंग्रेज़ी हुकूमत की गिरफ़्त में हो जाती तो वह एक बड़ी शहादत बन जाएगी.

गाँधी ने 1942 के विश्वयुद्ध में भारत को शामिल करने का विरोध किया था जिसके बाद उन्हें हवालात में डाल दिया गया था.

पक्ष और विपक्ष

ब्रिटेन शासित भारत के तत्कालीन वायसरॉय, लॉर्ड लिनलिथगो ने भी कहा था कि वो "मज़बूती के साथ गांधी के भूख से मरने की स्थिति के पक्ष में हैं."

पर कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने इस कद़म को ग़लत ठहराया.

पूर्व विदेश सचिव लॉर्ड हैलिफ़ैक्स ने तर्क रखा, "गांधी को मुक्त करने के चाहे जो भी नुक़सान हों पर उनको बंद रखना और भी ज़्यादा संकट पैदा कर सकता है."

वर्ष 1943 के जनवरी महीने में अधिकारियों ने तय किया कि गांधी को छोड़ दिया जाए, पर लोगों की नज़र में यह क़दम अंग्रेज़ों की सहानुभूति के रूप में सामने आना चाहिए ना कि दबाव के आगे अंग्रेज़ों के झुकने के जैसी.

हवाई जहाज़ निर्माण विभाग के तत्कालीन मंत्री सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स ने कहा था, "महात्मा गांधी की छवि कुछ धार्मिक हस्ती जैसी है इसलिए उनकी हमारी गिरफ़्त में मौत हमारे लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है."

चर्चिल का मत

चर्चिल का मत इनसे अलग था.

चर्चिल का मत था कि गांधी को क़ैद में ही रखा जाए और वो जो करना चाहें, करने दिया जाए.

हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें इसलिए छोड़ा जा रहा है क्योंकि वो भूख हड़ताल पर बैठ जाएँगे तो उन्हें तुरंत छोड़ देना चाहिए.

आख़िरकार 1944 में गांधी के ख़राब होते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि ब्रितानी हुकूमत को डर था कि उनकी गिरफ़्त में गांधी की मौत एक संकट बन सकती थी.

महात्मा गांधी की 78 वर्ष की उम्र में 30 जनवरी 1948 को हत्या कर दी गई थी.

Thursday, June 25, 2009

समय के साथ बदलते रहे खलनायक



हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक में धार्मिक कथाओं और किंवदंतियों पर सारी फ़िल्में बनीं. क्योंकि इस नई विधा में कथा प्रस्तुत करने के ज्ञान और साधन की कमी थी और दर्शक अपनी इन सुनी हुई कहानियों की सक्षम अभिव्यक्ति के अभाव में भी इन्हें पूरी तरह समझ लेता था.

इन कथाओं के नायक देव थे और खलनायक राक्षस गण. इसके बाद बनी इतिहास आधारित फ़िल्मों में दुष्ट शक्तियों से दर्शक परिचित थे.

ग्रामीण परिवेश की फ़िल्मों में तानाशाह जमींदार और सूदखोर महाजन खलनायक के रूप में प्रस्तुत किए गए. शहरी परिवेश की फ़िल्मों में लालची व्यक्ति या मकान मालिक या मिल मालिक को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया और प्रेम कथाओं में अस्वीकृत प्रेमी को खलनायक माना गया.

सितारों के उदय के बाद कलाकारों का चयन महत्वपूर्ण हो गया, मसलन न्यू थियेटर्स की ‘विद्यापति’ में राजा की भूमिका में सुंदर सुगठित पृथ्वीराज कपूर के होने के कारण महारानी के साथ प्रेम करते हुए कवि का पात्र दर्शकों को खलनायक सा लगा.

शशधर मुखर्जी की 1943 में प्रदर्शित ‘क़िस्मत’ में अपराधी का पात्र ही नायक रहा क्योंकि अशोक कुमार ने उसे अभिनीत किया था.

यह एंटी नायक छवि की पहली फ़िल्म थी और इस विधा का भरपूर विकास 30 वर्ष बाद अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों में देखा गया. टीनू आनंद की ‘शहंशाह’ में अमिताभ कहते हैं कि जहाँ वे खड़े होते हैं, वही न्यायालय है और उनकी इच्छा ही क़ानून है.

कुछ कलाकारों की छवि इतनी लोकप्रिय हो जाती है कि उनके द्वारा अभिनीत पात्र दर्शकों को नायक ही लगता है. इसी धारा की अगली कड़ी में शाहरुख खान अभिनीत ‘बाजीगर’, ‘डर’ और ‘डॉन’ में अपराधी ही नायक है.

गाँधी का प्रभाव

हिंदुस्तान में सिनेमा का जन्म 1913 में हुआ और दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गाँधी 1914 में भारत आए. उनका प्रभाव सभी क्षेत्रों और विधाओं पर पड़ा. शायद इसी कारण पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर नहीं थे और उनके चरित्र भी सुपरिभाषित नहीं थे

उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंध विश्वास से ग्रसित लोग थे.

‘अछूत कन्या’ में प्रेम-कथा के विरोध करने वाले जाति प्रथा में सचमुच विश्वास करते थे. इसी तरह मेहबूब खान की ‘नज़मा’ में पारंपरिक मूल्य वाला मुसलिम ससुर परदा प्रथा अस्वीकार करने वाली डॉक्टर बहु का विरोध करता है और अंत में परदा नहीं करने के कारण ही वह ससुर के हृदयघात को समय रहते समझ लेती है और उनके प्राण बचाती है.

उस दौर में अधिकांश खलनायक बुरी समाजिक प्रथाओं में विश्वास करने वाले निरीह प्राणी हैं. ‘दुनिया ना माने’ 1937 का वृद्ध विधुर युवा कन्या से विवाह को अपना अधिकार ही मानता है और गाँधी जी के आश्रम से लौटी उसकी बेटी उसे अन्याय से परिचित कराती है.

महाजन से डाकू तक

‘साहूकारी पाश’ में प्रस्तुत सूदखोर महाजन सआदत हुसैन मंटो द्वारा लिखी गई ‘किसान हत्या’ से होते हुए अपनी अन्यतम अभिव्यक्ति मेहबूब खान की ‘औरत’ 1939 में प्राप्त कर पाया और अभिनेता कन्हैयालाल ने इसी भूमिका को एक बार फिर 1956 में ‘मदर इंडिया’ में प्रस्तुत किया.

महाजन खलनायक के पात्र की झलक दोस्तोविस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ से प्रेरित रमेश सहगल की ‘फिर सुबह होगी’ में भी दिखी.

महात्माओं के देश के में डाकू हर काल खंड में रहे हैं और ये लोकप्रिय खलनायक सिद्ध हुए

आज़ादी की अलसभोर में प्रदर्शित राजकपूर की ‘आवारा’ में केएन सिंह अभिनीत डाकू पात्र इतना सहृदय था कि दाई के यह बताने पर कि वह गर्भवती का अपहरण कर ले आया है, वह उसे मुक्त कर देता है.

भारत में डाकू की एक छवि रॉबिनहुड नुमा व्यक्ति की भी रही है और उसे नायक की तरह भी माना गया है. समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के कारण मजबूरी में डाकू बनने वाले पात्र लोकप्रिय रहे हैं और सुनील दत्त की सतही ‘मुझे जीने दो’ के बाद यह पात्र दिलीप कुमार की ‘गंगा-जमुना’ में 'क्लासिक डायमेंशन' पाता है.

डाकू अपने बर्बर स्वरूप में रमेश सिप्पी की ‘शोले’ में प्रस्तुत होता है और ‘गब्बर’ नायकों से अधिक लोकप्रियता प्राप्त करता है. दरअसल गब्बर के चरित्र में बर्बरता के साथ सनकीपन को जोड़कर उसे कॉमिक्स के खलनायकों के समकक्ष खड़ा कर दिया गया है.

उसकी अपार लोकप्रियता के कारण कुछ नेताओं ने उसके आधार पर अपनी छवि गढ़ी और सनकीपन राष्ट्रीय सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन गया.

जीवन और कला के बीच आपसी लेन-देन के रिश्ते ऐसे ही चलते रहते हैं. गणतंत्र व्यवस्था अपनाने के बाद भी भारतीय समाज का मानस सामंतवादी रहा है और डाकू को जंगल के राजा के रूप में ही स्वीकार किया गया.

अप्रवासी भारतीय दर्शकों के आश्रय के कारण डॉलर सिनेमा के पनपने के कारण विगत दशक में डाकू फ़िल्में नहीं बनीं. महानगरों के सीमेंट के जंगल के खलनायक डाकुओं के ही नए स्वरूप हैं

आज़ादी के बाद सामाजवादी समाज की रचना के आदर्श के कारण एक ऐसी आर्थिक नीति सामने आई जिसने भ्रष्टाचार को जंगल घास की तरह फैलने के अवसर दिए और अव्यवहारिक कंट्रोल के कारण तस्करी का स्वर्ण युग प्रारंभ हुआ.

फ़िल्मों में तस्कर खलनायक का उदय हुआ, नकली करंसी बनाने वालों का वर्चस्व बना. समाजवादी स्वप्न के कारण पूजीपति को खलनायक बनाया गया, मसलन राजकपूर की ‘श्री 420’ में सेठ सोनाचंद धर्मानंद चुनाव भी लड़ता है और काले धंधों का ‘आठ सौ चालीस’ है.

यह उस युग की बात है जब अर्थनीति 'सेंटर' में थी और आज जब अर्थनीति की रचना में ‘लेफ्ट’ शामिल है, ‘गुरू’ जैसी फ़िल्म बनती है जिसमें पूंजीपति पुनः खलनायक होते हुए भी नायक की तरह प्रस्तुत है और आख़िरी रील में वह स्वयं को महात्मा गाँधी के समकक्ष खड़ा करने का बचकाना प्रयास भी करता है. दुख की बात है कि उसके प्रयास पर सिनेमाघरों में तालियां भी बजाई गई हैं. खलनायक की छवि में यह परिवर्तन समाज के बदलते हुए मूल्यों को रेखांकित करता है.

पाँचवे और छठे दशक में ही देवआनंद के सिनेमा पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय में अमरीका में पनपे (noir) नोए सिनेमा का प्रभाव रहा और खलनायक भी जरायम पेशा अपराधी रहे हैं जो महानगरों के अनियोजित विकास की कोख से जन्में थे.

समाज में हाजी मस्तान का उदय हुआ. सलीम जावेद ने ‘मदर इंडिया’ और ‘गंगा जमुना’ तथा मार्लिन ब्रेडों अभिनीत ‘वाटर फ्रंट’ से प्रभावित होकर हाजी मस्तान की छवि में ‘दीवार’ के एंटी नायक को गढ़ा जिसमें उस कालखंड का आक्रोश भी अभिव्यक्त हुआ.

इसी समय से नायक खलनायक की छवियों का मेल-जोल भी प्रारंभ हुआ. इसी कालखंड में श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ में खलनायक जमींदार ही रहे परंतु अब वे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे.

राजनीति में अपराध का समावेश नेहरू की मृत्यु के बाद तीव्रगति से हुआ और फ़िल्मों में भी नेता के पात्र को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया जैसा हम राहुल रवैल की ‘अर्जुन’ और अमिताभ अभिनीत ‘आख़िरी रास्ता’ और ‘इंक़लाब’ इत्यादि में देखते हैं.

पुलिस में अपराध के प्रवेश को गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ में रेखांकित किया गया और पुलिस के राजनीतिकरण और जातिवाद के ग्रहण को ‘देव’ में

विगत दशक में कोई फ़िल्म ऐसी नहीं आई जिसमें 'गब्बर' या 'मोगाम्बो' की तरह बर्बर और सनकी नायक प्रस्तुत हुए हैं क्योंकि समाज के नायक-खलनायक का अंतर मिटता जा रहा है.

हमारी संसद और विधानसभाओं में दागी लोगों का प्रतिशत बढ़ गया है. आर्थिक उदारवाद के बाद जीवन शैली और मूल्य में अंतर आ गया है.

डॉलर सिनेमा और मल्टीप्लैक्स ने खलनायक को या तो गैर ज़रूरी कर दिया है या ‘डॉन’, ‘धूम’ और ‘बंटी-बबली’ की तरह दागी चरित्रों को महामंडित कर दिया गया है. स्वयं फ्राँसिस फोर्ड कपोला ने स्वीकार किया था कि गॉडफादर-I में अपराध आभा मंडित हो गया है.

हिंदुस्तानी सिनेमा का अर्थशास्त्र और विचार प्रक्रिया सितारा केंद्रित बन चुकी है, इसलिए लोकप्रिय सितारा एक ही फ़िल्म में नायक भी है, खलनायक भी है और हास्य अभिनेता भी है गोयाकि वह नायिका की भूमिका छोड़कर सब कुछ कर रहा और उसके हर स्वरूप में सहानुभूति उसी के साथ है.

विगत दशक में भारत में कुछ लोगों को विपुल धन कमाने के अवसर मिले हैं और एक ‘चमकदार भारत’ की छवि उभरी है.

इस संपदा ने देश के जलसा-घर में हास्य उद्योग खड़ा कर दिया है जबकि सचमुच प्रसन्न देशों की सूची में हमारा नंबर 46 है. फिर भी वातावरण में ठहाके हैं, गलियारों में गॉसिप है, यथार्थ पर अयथार्थ का भारी सत्य है.

शायद इन्हीं सब आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से सिनेमा को खलनायक विहीन कर दिया गया और हिंदुस्तानी सिनेमा की उस परंपरा का लोप सा हो गया जिसमें नायक का क़द खलनायक की बर्बरता के मानदंड पर मापा जाता था.

वह अपने मूल रूप में लौटेगा क्योंकि वह उत्तेजक है


Tuesday, June 23, 2009

भारतीय मुसलमान:60 साल का अरसा !!


दक्षिण एशिया उप महाद्वीप में अल्पसंख्यकों का मुद्दा हमेशा ही चर्चा में रहा है. भारत में मुसलमानों को आज़ादी के साठ साल में क्या मिला है, क्या हैं उनके मुद्दे और चिंताएँ. क्या अपेक्षाएँ हैं मुसलमानों को सिस्टम और हिंदुओं से. क्या ख़ुद मुसलमान सिस्टम और बहुसंख्यक समाज की अपेक्षाओं को पूरा कर पाए हैं.
जब भारत की आज़ादी के ऐलान के साथ ही जन्म लिया था एक नया जहाँ बनाने की उम्मीदों ने. आज़ादी मिली तो, मगर भारी क़ीमत चुकाने के साथ. लाखों लोगों की जान और भारी माल का नुक़सान. विभाजन की तलख़ियाँ भारत में आज भी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं.
पत्रकार कुलदीप नैयर को बँटवारे का वो दर्द अब भी याद है, "बँटवारे के बाद कुछ ऐसी चीज़ें और बातें जो हमने सोची थीं कि नहीं होंगी, वो हुईं. मिसाल के तौर पर हम चाहते थे कि हम अपने पैत्रिक स्थान स्यालकोट (अब पाकिस्तान में) में रहें यानी पाकिस्तान में हिंदू और भारत में मुसलमान रहें लेकिन ये हुआ कि वहाँ से हम पर दबाव पड़ा कि आप निकलिए और इसी तरह से भारत में मुसलमानों को पंजाब और दिल्ली से निकाला गया. विभाजन में, कहते हैं कि कम से कम दस लाख लोग मर गए. तो दोनों मुल्कों का जन्म ख़ून के ज़रिए हुआ."

1947 के बाद कुछ समय तक भारतीय भारतीय मुसलमानों में को इन सवालों का सामना करना पड़ा कि बँटवारे के लिए वही ज़िम्मेदार थे मगर सामाजिक चिंतक असग़र अली इंजीनियर कहते हैं कि बँटवारे के लिए मुसलमानों का सिर्फ़ क्रीमी तबक़ा ज़िम्मेदार था, "ये बात बहुत बड़ा झूठ है कि विभाजन के लिए सारे मुसलमान ज़िम्मेदार थे, विभाजन के लिए चार-पाँच प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान ज़िम्मेदार नहीं थे. विभाजन के आंदोलन में उन्हीं मुसलमानों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया जिन्हें भारत में अपने हितों के लिए ख़तरा नज़र आया था, मसलन ज़मींदार तबके को भारत में अपनी ज़मींदारी के लिए ख़तरा नज़र आया था."

असग़र अली इंजीनियर कहते हैं कि आम मुसलमानों ने विभाजन के विचार का भारी विरोध किया था इसलिए आम मुसलमान विभाजन के लिए क़तई ज़िम्मेदार नहीं था

दूसरी तरफ़ समाज शास्त्री प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं कि भारतीय मुसलमान काफ़ी समय तक द्वंद्व का शिकार रहे, "आज़ादी के बाद पंद्रह साल के समय तक भारतीय मुसलमान इस विश्वास को हासिल नहीं कर सके कि उनके हालात इस देश में किस तरह के होंगे- अच्छे या बुरे. उन पंद्रह वर्षों में मुसलमान इस अनिश्चितता का शिकार रहे कि वे भारत में रहेंगे या नहीं."

प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ के अनुसार मुसलमानों ने इसी अनिश्चितता की वजह से देश की प्रगति में भागीदारी के लिए कोई ख़ास गतिविधियाँ और कोई प्रगतिशीलता भी नहीं दिखाई, कोशिश ही नहीं की, ख़ुद को सरकार से भी अलग रखा और ये फ़ैसला नहीं कर सका कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए.

लेकिन 1960 का दशक पूरा होते-होते भारत और पाकिस्तान ने वह विकल्प बंद कर दिया जिसमें भारत से पाकिस्तान या पाकिस्तान से भारत आकर बसने की सुविधा समाप्त कर दी गई थी जिसके बाद बहुत से भारतीय मुसलमानों के सामने देश में ही रहने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा.

प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद की नज़र में मुसलमानों ने 1970 तक आते-आते आत्मविश्वास बटोरा और सिस्टम में भागीदारी शुरू की. साथ ही कारोबारी गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया.

उधर जामिया मिलिया इस्लामिया के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन उन हालात को कुछ अलग नज़र से देखते हैं, "आज़ादी और विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों को एक नई व्यवस्था में रहना था जो धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक थी जिसके आधार पर उन्हें अपनी ज़िंदगी को बनाना और संवारना था और यह कोई आसान काम नहीं था और उन्होंने कोशिश की और धर्मनिर्पेक्षता को उन्होंने अपनाया और राष्ट्रनिर्माण के कार्य में भी हिस्सेदारी की.

मगर मुसलमानों के लिए हालात कोई बहुत सीधे और सपाट नहीं थे. इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान कहते हैं कि मुसलमानों को भारत में जो कुछ मिला है वह हिंदू समुदाय की मेहरबानी है और उन्हें इस देश में जो कुछ भी मिला है, उसका उन्हें अधिकार ही नहीं था इसलिए उन्हें ज़्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए

इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान कहते हैं, "स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुसलमानों ने जो बलिदान दिए उनके बदले उन्हें पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश मिल गया और इस तरह उन्होंने अपनी क़ुर्बानियों को भुना लिया. विभाजन की दलील ही ये थी कि भारत हिंदू का और पाकिस्तान मुसलमान का, तो फिर अब भारत में उनका अधिकार कैसा. इसके उल्टे हिंदु समुदाय ने बड़ी बात की है कि आज़ाद भारत में भी मुसलमानों को बराबरी का दर्जा दे दिया."

इसी तरह की दलीलों में से मुसलमानों को अक्सर ऐसे सवालों का भी सामना करना पड़ा है कि वे पहले हिंदुस्तानी हैं या मुसलमान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक तरूण विजय का तो यह कहना है कि हिंदू बहुल देश भारत में हिंदुओं को ही उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है, "1947 में मातृभूमि के विभाजन के बाद जो बचा-खुचा हिंदुस्तान हिंदुओं को मिला उस बचे-खुचे हिंदुस्तान में भी वे आज़ादी के साथ अपनी सभ्यता और संस्कृति की बात नहीं कर सकते. इस देश में ग़ैर-हिंदू होना फ़ायदे की और हिंदू होना घाटे की बात हो गई है."

तरूण विजय कहते हैं, "मुसलमानों को चाहिए था कि वे हिंदू समाज के साथ वैसे ही घुलमिलकर रहते जैसा कि दूध में शक्कर होती है लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अपनी अलग पहचान के लिए ज़्यादा चिंतित नज़र आते हैं."

तरूण विजय सवाल उठाते हैं कि मुसलमान हिंदुस्तान में तो इसीलिए रहे हैं कि वे हिंदुस्तान को मानते हैं, तो फिर हिंदुस्तानियत की बात क्यों नहीं करते.

तो फिर क्या मुसलमान हिंदुस्तानी बनकर नहीं रहे हैं. कहा जाता है कि वे पाकिस्तान से हमदर्दी रखते हैं, मुख्य धारा में शामिल नहीं होना चाहते, आधुनिक शिक्षा से बचते हैं, जेहादी और दंगाई होते हैं, रूढ़िवादी हैं, औरत को पाँव की जूती समझते हैं, एक झटके में तलाक दे देते हैं, चार-चार शादियाँ करते हैं, वग़ैरा वग़ैरा...

तो मुसलमानों के मुद्दे आख़िर हैं क्या? जायज़ा लेने लिए हमने कई स्थानों का दौरा किया और पाया कि एक ही मुद्दे पर कितनी अलग-अलग राय हो सकती है. हमने विभिन्न लोगों के सामने सबसे पहले यही सवाल रखा कि क्या मुसलमानों को साठ साल के दौरान उनका हक़ मिला है

दिल्ली की जामा मस्जिद इलाक़े में रहने वाले मोहम्मद जफ़र नामक एक मुसलमान का कहना था, "अभी तो कोई हक़ नहीं मिला है. हम दिल्ली में पैदा हुए हैं और देख रहे हैं कि जब राजधानी में हमें हक़ नहीं मिला है तो देश के बाक़ी हिस्सों में मुसलमानों को क्या हक़ मिला होगा."

हालाँकि मोहम्मद ज़फ़र यह स्वीकार करते हैं कि एक समय ऐसा था जब मुसलमानों के ज़्यादा बच्चे होते थे और शिक्षा की तरफ़ ध्यान नहीं दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है और उनके अनुसार अब मुसलमान शिक्षा के प्रति बहुत ध्यान दे रहे हैं और अब बच्चे भी कम हो रहे हैं मगर अच्छा जीवन जीने के लिए समुचित सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं.

पाकिस्तान की तरफ़ झुकाव रखने से संबंधित सवाल के जवाब में मोहम्मद जफ़र का कहना था, "यह पाकिस्तान के लिए झुकाव नहीं है. हमारा तो मज़हब भी यही कहता है कि जिस देश में रहते हैं उसी के बारे में सोचें और ज़रूरत पड़े तो क़ुर्बानी भी दें. असल बात ये है कि वहाँ रहने वाले रिश्तेदारों के लिए हमदर्दी रहती है जिसे पाकिस्तान के लिए झुकाव समझ लिया जाता है."

नई दिल्ली के हरे-भरे इलाक़े में स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को ज्वलंत मुद्दों पर गर्मागरम बहस का स्थान माना जाता है. एक शाम हम भी वहाँ पहुँचे और शाम की चाय की चुस्कियाँ ले रहे छात्रों के सामने सवाल उछाल दिया कि क्या मुसलमानों को साठ साल के दौरान उनका हक़ मिला है, बस गर्मागरम बहस छिड़ गई.

एक छात्र का कहना था, "सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि आज़ादी के बाद से ही मुसलमानों से बहुत से वादे किए गए लेकिन असल में किया कुछ नहीं गया है और इसके लिए सभी सरकारें ज़िम्मेदार रही है. सबसे पहले तो यह समझना होगा कि मुसलमानों का पिछड़ापन एक समस्या है और जब इस समस्या को मान लिया जाए तो इसके हल के लिए कोशिश करनी होगी.